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छींक-विचार


छींक प्रायः सभी दिशाओं की खराब होती है। अपनी छींक महा-अशुभ है। गौ की छींक मरण करती है। बायीं ओर छींक हो तो दोषकारक नहीं है।

'सम्मुख छींक लड़ाई भाखे।

छींक दाहिने द्रव्य विनाशे॥

ऊँची छींक कहे जयकारी।

नीची छींक होय भयकारी॥

कन्या, विधवा, मालिन, धोबिन, वेश्या, रजस्वला स्त्री और अन्त्यज की छींक विशेष अशुभ होती है।

आसन, शयन, शौच, दान, भोजन, औषधि-सेवन, विद्यारम्भ और बीज बोने के समय, युद्ध या विवाह, सर्दी से होने वाली छींक, बच्चे और बूढ़े की छींक तथा हठ से छींकना विफल होता है, कोशिश करने पर भी यदि छींक न रुके तो मनुष्य जिस काम के लिए जा रहा हो उसमें विघ्न अवश्य होगा। 'एक नाक दो छींक, काम बने सब ठीक' यह भी लोकोक्ति है।

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१. सभी कुछ ठीक होने के बाद भी घर में संतान न होना| २.बिना वजह अस्वस्थ रहना| ३.आर्थिक तथा मानसिक समस्या का रहना| ४.नींद न आना तथा अत्यधिक गुस्सा- चिड़चिड़ापन रहना| ५. पारिवारिक सम्बन्धो में दरार आना| ६.

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