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गुरु-शुक्र के अस्त में वर्जित कर्म


बावड़ी, बगीचा, कुआँ, मकान का प्रारम्भ और प्रतिमा, व्रतारम्भ, व्रतोद्यापन, दान, गोदान, प्रथम उपाकर्म, वृषोत्सर्ग, चौल (मुण्डन), देवता स्थापन, दीक्षा, यज्ञोपवीत, विवाह, अपूर्व देवतीर्थ-दर्शन, संन्यास, अग्न्याधान, अभिषेक, समावर्तन, चातुर्मास्य, यज्ञ, कर्णवेध, विद्यारम्भ ये कर्म गुरु, शुक्र के अस्त, बाल, वृद्धत्व तथा मलमास में करना निषिद्ध है।

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१. सभी कुछ ठीक होने के बाद भी घर में संतान न होना| २.बिना वजह अस्वस्थ रहना| ३.आर्थिक तथा मानसिक समस्या का रहना| ४.नींद न आना तथा अत्यधिक गुस्सा- चिड़चिड़ापन रहना| ५. पारिवारिक सम्बन्धो में दरार आना| ६.

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