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दिशाशूल

सोम शनिचर पूरब न चालू I मंगल बुध उत्तर दिशि काल II

रवि शुक्र जो पश्चिम जाय I हानि होय पथ सुख नहिं पाय II

बीफे दक्खिन करे पयाना। फिर नहिं समझो ताको आना ll


दिशाशूल नक्षत्र तथा योगिनी-वास चक्र

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं को सब जानते हैं, लेकिन इनके बीच की अन्य चार दिशायें सबको स्मरण नहीं रहती। अतः आठों दिशाओं तथा उनके नक्षत्र-शूल, दिशाशूल और योगिनीवास, जो तिथियों को सरलतापूर्वक तत्काल जान लेने के लिए हम ऊपर चक्र दे रहे हैं। इसमें प्रत्येक दिशा के नीचे पहले नक्षत्र का नाम है, फिर वार तथा वारों के अन्त में वे तिथियाँ दी हुई हैं, जिन तिथियों को उस दिशा में योगिनी का वास होता है, उन तिथियों को उस दिशा में जाने से स्वभावतः यात्री के सम्मुख पड़ेगी और सम्मुख तथा दाहिने की योगिनी अशुभ होती है। अतः जिन तिथियों की योगिनी सम्मुख तथा दाहिने पड़े, उन तिथियों को तथा जिस दिशा के नीचे जो नक्षत्र और वार लिखे हैं, उन नक्षत्र तथा वारों में उस दिशा की ओर यात्रा नहीं करनी चाहिए।

समयशूल-उषाकाल में पूरब की, गोधूल में पश्चिम की, अर्धरात्रि में उत्तर की, मध्याह्न काल में दक्षिण को नहीं जाना चाहिए।

दक्षिण यात्रा का निषेध-कुम्भ और मीन के चन्द्रमा में अर्थात् पंचक में कदापि न जाय।

चन्द्रमा की दिशा और उसका शुभाशुभ फल –

मेष, सिंह, धनु, पूरब चन्दा, दक्षिण कन्या वृष मकरन्दा l

पक्षिम कुम्भ, तुलायां मिथुना, उत्तर कर्क, वृश्चिक, मीना II

अर्थात् मेष, सिंह और धनु राशि का चन्द्रमा पूर्व में, वृष, कन्या और मकर राशि का दक्षिण में, मिथुन, तुला और कुम्भ का पश्चिम में, कर्क, वृश्चिक, मीन का चन्द्रमा उत्तर में रहता है। यात्रा में चन्द्रमा सम्मुख या दाहिने शुभ होता है। पीछे होने से मृत्यू तुल्य कष्ट, अल्प कष्ट और बायीं ओर होने से हानि होती है।

यात्रा में शुभाशुभ लग्न - कुम्भ. या कुम्भ के नवांशक में यात्रा कदापि न करें। शुभ लग्न वह है, जिसमें 1,4,5,7,9,10, स्थानों में शुभ ग्रह और 3,6,10,11 में पाप-ग्रह हों। अशुभ लग्न वह है, जिसमें 1,6,8,12वें चन्द्रमा, 10वें शनि,7वें शुक्र, 7,12,6,8 वें लग्नेश हों।

प्रस्थान विधान– यदि किन्हीं जरूरी कारणों से यात्रा के मुहूर्त में न जा सकें, तो उसी मुहूर्त में ब्राह्मण जनेऊ-माला, क्षत्रिय शस्त्र, वैश्य शहद, घी, शूद्र फल को अपने वस्त्र में बांधकर किसी के घर या नगर से बाहर जाने की दिशा में प्रस्थान रखें। उपर्युक्त चीजों के बजाय मन की सबसे प्यारी वस्तु को भी प्रस्थान में रख सकते हैं।

यात्रा के पहले त्याज्य वस्तुयें - यात्रा के तीन दिन पहले दूध, पाँच दिन पहले हजामत, तीन दिन पहले तेल, सात दिन पहले मैथुन त्याग देना चाहिए। यदि इतना न हो सके, तो कम से कम एक दिन पहले तो ऊपर की सब वस्तुओं को अवश्य ही छोड़ देना चाहिए।

यात्रा के पहले ग्राह्य वस्तुएं -

रवि को पान, सोम को दर्पन,

मंगल को गुड़ करिये अर्पन।

बुध को धनिया, बीफै जीरा,

शुक्र कहे मोहिं दधि का पीरा।

कहें शनी मैं अदरख पावा,

सुख-सम्पत्ति निश्चय घर लावा।

रवि को पान खाकर, सोम को शीशे में मुँह, देखकर, मंगल को गुड़, बुध को धनियाँ, गुरु को जीरा, शुक्र को दही और शनि को अदरख खाकर यात्रा करने से कार्य सफल होता है।

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